आसान नहीं होगा बैंक ऋणी का जमानती बनकर चेक देकर बचना मिलेगी सजा – Sainyadham Express

आसान नहीं होगा बैंक ऋणी का जमानती बनकर चेक देकर बचना मिलेगी सजा

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माननीय न्यायालय ने आरोपी श्री भानू प्रताप का कृत्य सामाजिक हित के विपरित तथा आर्थिक अपराध की श्रेणी जैसे टिप्पणी के आदेश पारित किये गये।

न्यायालय ने दिया चेक बाउंस के मामले मे 1 वर्ष का साधारण कारावास तथा 26,65,000 रूपये अर्थदण्ड के आदेश।

चैक अनाद्ररण के मामले में न्यायालय चतुर्थ अपर मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट साहिस्ता बानों की अदालत ने अरोपी श्रीमती विजय लक्ष्मी के गारण्टर पति श्री भानू प्रताप को दोषी करार देते हुए 1 वर्ष तक का कारावास के साथ 26,65,000/- रूपये अर्थदण्ड तथा 26,60,000/- रूपये प्रतिकर एवं 5,000 रूपये राजकोष में जमा करने के आदेश पारित किये गये तथा अर्थदण्ड अदा न करने के व्यतिक्रम मे 3 माह का अतिरिक्त कारावास भोगने का निर्णय सुनाया गया है।

परिवादी के अधिवक्ता दीपक मेंगवाल द्वारा अकाट्य साक्ष्य प्रस्तुत कर परिवादी के परिवाद की ठोस पैरवी पैरवी की गयी। परिवादी पंजाब नेशनल बैंक शाखा अजबपुर कलां, जिला देहरादून ने आरोपी श्रीमती विजय लक्ष्मी पत्नी श्री भानू प्रताप प्रोपराईटर माया हैण्डीकाफट निवासी 713, गढी कैन्ट, फासी कॉलोनी, डाकरा जिला देहरादून व गारण्टर श्री भानू प्रताप पुत्र श्री रविन्द्र मोहन निवासी 713 गढी कैन्ट, फासी कॉलोनी, डाकरा जिला देहरादून के विरूद्ध दिनांक 27.03.2017 के विरूद्ध परिवाद प्रस्तुत किया गया था। परिवादी ने बताया कि अरोपितों ने ओ० डी० ऋण हेतु आवेदन किया था और बैंक द्वारा 24,00,000 रूपये का ऋण स्वीकृत किया गया था। आरोपी द्वारा ऋण की किस्तो की अदायी न करने पर आरोपितों का ऋण खाता एन०पी०ए० हो गया। परिवादी बैंक द्वारा आरोपितों से बकाया ऋण राशि के लिए कई बार निवेदन किया गया, कुछ समय पश्चात् आरोपी श्री भानू प्रताप के द्वारा 26,50,000 रूपये का चैक परिवादी बैंक को दिया गया, जो अनाद्रित हो गाया, शिकायतकर्ता ने जब आरोपियों से अपने रूपये वापस मॉगें तो आरोपी काफी समय तक टालते रहे उसके बाद शिकायतकर्ता ने नोटिस भेजा फिर भी रूपये न लौटाने पर परिवाद प्रस्तुत कर न्यायालय मे ठोस साक्ष्य प्रस्तुत कर आरोपी को सजा दिलाकर परिवादी बैंक के लोगधन को वापस न करने व बैंक को गुमराह करने वाले दोषी गारण्टर को दण्डित करवाया गया। माननीय न्यायालय द्वारा आरोपी श्री भानू प्रताप का कृत्य सामाजिक हित के विपरित तथा आर्थिक अपराध की श्रेणी में रखा गया।

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