
चार साल के कार्यकाल में प्रतिष्ठित वैश्विक स्तर के आयोजनों से मुख्यमंत्री धामी ने खींचा देश और दुनिया का ध्यान


वरिष्ठ पत्रकार दीपक फर्स्वाण की कलम से
मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami ने आज अपने कार्यकाल के चार वर्ष पूरे कर लिये हैं। इससे पहले की सरकार में उनका कार्यकाल महज 8 महीने का रहा। इन दोनों कालखण्ड में धामी बतौर मुख्यमंत्री अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सफल रहे। चार साल में प्रदेश को तमाम महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुईं। कुछ कल्याणकारी योजनाएं और सख्त कानून लागू हुए। वैश्विक स्तर के प्रतिष्ठित आयोजनों ने देश और दुनिया का ध्यान उत्तराखण्ड की ओर खींचा। धामी सरकार की अनेक उपलब्धियां अभूतपूर्व हैं क्योंकि वो पहली बार प्राप्त हुई हैं। केन्द्र पोषित कुछ अहम योजनाओं के क्रियान्वयन में भी उत्तराखण्ड अग्रणी रहा। इसमें कोई दोराय नहीं कि अब उत्तराखण्ड और पुष्कर सिंह धामी एक-दूसरे की पहचान बन चुके हैं। आम लोगों के बीच उपलब्धता से धामी ‘जनता के मुख्यमंत्री’ के तौर पर अपनी छवि बनाने में कामयाब रहे। क्रियाशीलता और गतिशीलता उन्हें Next Level पर ले कर गई। यह भी तय हो चुका है कि उत्तराखण्ड में सबसे लम्बे समय तक सरकार प्रमुख बने रहने का रिकॉर्ड भी धामी के नाम पर दर्ज होगा।
पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाने से ज्यादा प्रासंगिक यह है कि वह ये सब कैसे कर पाए, इस पर चर्चा की जाए। इसके पीछे उनका कठोर परिश्रम, स्व-अनुशासन और राग-द्वेष के बिना कार्य करने की विशिष्ट शैली प्रमुख है। जीवन में अनावश्यक तड़क-भड़क से दूर रहकर सादगी को अपनाना, राजनीति में संयम बरतना और हर परिस्थिति में क्रियाशील बने रहना यही वो गुण हैं जिन्होंने धामी को प्रदेश की सियासत में सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाया। इतनी बड़ा पद और पॉवर मिलने के बाद भी धामी सत्ता के अहंकार में कभी नहीं डूबे। घमण्ड और ‘मैं’ भाव से मुक्त रहकर वह राजकाज चलाते रहे। विनम्रता, आत्म जागरूकता और विरोधी के प्रति भी सम्मान का जीवन दर्शन उन्होंने अपनाया। वरना, दुर्गम पिथौरागढ़ जिले के टुंडी (पैतृक गांव हरखोला) में जन्मा यह राजनेता कामयाबी के शिखर पर पहुंचकर उसे बरकरार कैसे रख पाता, वो भी उस प्रदेश में जहां मुख्यमंत्री अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने को तरस जाते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दौरान धामी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए थे। संगठन के साथ वह कार्यक्रम समन्वयक की भूमिका में रहे। वर्ष 2000 में पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने पर उन्होंने देहरादून का रूख किया। 2001 में उनके राजनैतिक गुरू Bhagat Singh Koshyari को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली तो उन्होंने धामी को अपना सलाहकार नियुक्त किया। इस जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद धामी ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। यही राजनैतिक संगठन उनके लिए उपयोगी मंच बना और उन्होंने राज्य के उद्योगों में स्थानीय युवाओं के लिए 70% रोजगार के अवसर आरक्षित करने के लिए जोरदार लड़ाई लड़ी। हर दायित्व को निष्ठा से निभाते हुए वे संगठन और समाज में अलग पहचान बनाने में सफल हुए। इसके फलस्वरूप उन्हें उत्तराखण्ड की विधानसभा के लिए वर्ष 2012 में खटीमा से निर्वाचित होने का अवसर मिला। इसी सीट से उन्हें 2017 में लगातार दूसरी जीत मिली। उनकी किस्मत का सितारा अचानक उस वक्त चमका जब उन्हें 4 जुलाई 2021 को उत्तराखंड के 10वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस वक्त धामी मुख्यमंत्री पद के लिए एकदम नया चेहरा थे। 23 मार्च 2022 तक के महज 8 माह के कार्यकाल में उन्होंने संयमित पारी खेली और भाजपा सरकार की एंटी-इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को प्रो-इनकम्बेंसी (सत्ता समर्थक लहर) में बदल दिया। नतीजा भाजपा की प्रचंड जीत के रूप में सामने आया। रवायत टूटी और इतिहास में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी ने उत्तराखण्ड में लगातार दोबारा सरकार बनाई। हालांकि, धामी को अपनी सीट खटीमा से हार का सामना करना पड़ा। फिर भी पार्टी आलाकमान ने उन पर भरोसा जताया और सबको चौंकाते हुए उन्हें दूसरी बार मुख्यमंत्री बना दिया।
हुआ यह था कि महज आठ माह के पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के तौर पर धामी की कुछ खूबियां (सरल स्वभाव और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता) सामने आई थीं। इन्हीं खूबियों ने धामी को प्रधानमंत्री Narendra Modi की नजरों में सबसे उपयुक्त बनाया था। अब अपने दूसरे कार्यकाल में भी धामी धुआंधार बैटिंग कर रहे हैं। लगातार कर रहे हैं, चार साल से नॉट आउट हैं। इस अवधि में कई चुनौतियां उनके सामने आईं फिर भी वे बड़े और कड़े फैसले लेने से नहीं चूके। उनकी सरकार के कुछ निर्णय दूसरे राज्यों के लिए नजीर बन गए। भर्ती परीक्षाओं के लिए सख्त नकल विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता, स्थानीय महिलाओं को सरकारी नौकरी में 30 फीसदी आरक्षण, राज्य आन्दोलनकारियों को 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण, सख्त धर्मांतरण कानून, जमीन जेहाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, अंत्योदय परिवारों को साल में तीन मुफ्त गैस सिलेण्डर और सख्त भू कानून जैसे फैसलों ने धामी को राज्य के बाहर भी लोकप्रिय बना दिया। ‘जी20’ के तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम, ‘उत्तराखण्ड ग्लोबल इन्वेस्टर समिट’ और राष्ट्रीय खेलों के सफल आयोजन से भी धामी ने पूरे राष्ट्र का ध्यान उत्तराखण्ड की ओर आकर्षित किया। देखते ही देखते उत्तराखण्ड की सियासत में पुष्कर का कद बड़ा हो गया। उनकी हार्डकोर हिन्दुत्व वाली छवि को भाजपा ने अपने लिए मुफीद माना। यही वजह रही कि पार्टी हाईकमान ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनाव के प्रचार में धामी का उपयोग बड़े पैमाने पर किया। पांचों राज्यों में भाजपा की सरकार बनी। इन राज्यों में भी भाजपा ने अपनी सरकार बनने पर मोहन यादव, भजन लाल शर्मा, विष्णुदेव सहाय, नायब सिंह सैनी और रेखा गुप्ता जैसे नए चेहरों के सीएम बना दिया। उत्तराखण्ड में किए गए पुष्कर प्रयोग की सफलता को देखते हुए भाजपा की सियासत में नए चेहरों की ताजपोशी का नया दौर शुरू हो चुका था। अब इन चेहरों के पास अपनी काबीलियत साबित करने का मौका है। पुष्कर यह काम अपने 4.8 साल के कार्यकाल में बखूबी कर चुके हैं।