आज उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस की गई जिसमें कहा गया कि धामी सरकार को खनन प्रेमी सरकार क्यों कहा जाता है, यह आज आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों से पूरी तरह साबित हो गया है। पुष्कर सिंह धामी ने 4 जुलाई 2021 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और ठीक दो महीने बाद उनके प्रिय अधिकारी मीनाक्षी सुंदरम ने कोविड-19 महामारी और “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” का हवाला देकर एक ऐसा शासनादेश निकाला जिसने उत्तराखंड में खनन माफियाओं के लिए खुले लूट का रास्ता खोल दिया। इस शासनादेश के अनुसार अब स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स के नवीनीकरण की प्रक्रिया केवल स्वप्रमाणित शपथपत्रों पर आधारित कर दी गई, जिसमें आवेदक स्वयं घोषणा कर देगा कि सभी नियमों का पालन किया गया है। यह नीति केवल एक महीने के लिए बनाई गई थी लेकिन इस छोटे से समय में खनन का ऐसा खेल खेला गया जिसने पूरे उत्तराखंड को हिला कर रख दिया।

पहले नवीनीकरण की प्रक्रिया बेहद सख्त थी। फर्मों को प्रमाणिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट देनी होती थी, पर्यावरण विभाग, वन विभाग और राजस्व विभाग से अनुमति लेनी होती थी, साथ ही एक समिति स्थल निरीक्षण करती थी, वीडियोग्राफी और ड्रोन फुटेज तैयार किए जाते थे ताकि पारदर्शिता बनी रहे। लेकिन धामी के शासनादेश ने सारी पारदर्शिता को कचरे में फेंक दिया और खनन माफियाओं को खुली छूट दे दी।

इसके बाद मुख्यमंत्री ने अपने प्रिय अधिकारी राजपाल लेघा को नोडल अधिकारी नियुक्त कर पूरी जिम्मेदारी सौंप दी और 21 सितंबर को नवीनीकरण की संस्तुति देने हेतु एक और प्रिय अधिकारी एल.एस. पैट्रिक को अधिकृत कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सिर्फ 17 दिनों में 150 से अधिक स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स को नवीनीकरण की अनुमति दे दी गई।

आरटीआई से सामने आए दस्तावेजों ने इस पूरे खेल की परतें खोल दीं। जिन आवेदनों के आधार पर नवीनीकरण हुआ उनमें लगभग एक जैसी हैंडराइटिंग पाई गई, जिससे साफ है कि सारे आवेदन कुछ गिने-चुने लोगों ने भर दिए। कई प्लांट्स की पर्यावरणीय अनुमति खत्म हो चुकी थी या थी ही नहीं, वन विभाग की अनुमति ली ही नहीं गई। वन विभाग ने कई जगहों को आरक्षित वन भूमि मानकर अनुमति देने से साफ इनकार कर दिया था, बावजूद इसके वहां भी नवीनीकरण कर दिया गया। खसरा-खतौनी में स्वामित्व ही नहीं था, न मालिकों के नाम और न ही किराए या लीज़ का कोई जिक्र। राजस्व विभाग से भी कोई अनुमति नहीं ली गई। यहां तक कि कई आवेदन पत्रों के सीरियल नंबर तक मेल नहीं खा रहे थे। आलम यह रहा कि कई आवेदनों में जिस दिन आवेदन पत्र भरा गया उसी दिन जांच भी पूरी हो गई और उसी दिन अनुज्ञा की संस्तुति भी कर दी गई।
कुल मिलाकर एक शासनादेश की आड़ में 150 से अधिक स्टोन क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट्स का नवीनीकरण कर दिया गया। सूत्रों के अनुसार इस खेल में हर क्रेशर और स्क्रीनिंग प्लांट से 2 से 3 करोड़ रुपये तक वसूले गए और सिर्फ 17 दिनों में लगभग 300 से 400 करोड़ रुपये चुनावी फंड के लिए इकट्ठा कर लिए गए।
यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि पूरे उत्तराखंड की आत्मा पर किया गया डाका है। यह सरकार जनता की नहीं बल्कि खनन माफियाओं की सरकार है। पुष्कर सिंह धामी के शासन में नदियों को लूटा गया, जंगलों को उजाड़ा गया और पहाड़ों को बेचा गया।
मीनाक्षी सुंदरम, राजपाल लेघा और एल.एस. पैट्रिक जैसे प्रिय अधिकारियों के सहारे चलाया गया यह खेल साफ कर देता है कि धामी सरकार वास्तव में उत्तराखंड को लूटने वाली सरकार है। धामी की पहचान अब केवल एक ही है—खनन प्रेमी मुख्यमंत्री और खनन प्रेमी सरकार।